महिला प्रकोष्‍ठ

            दुनिया की आधी आबादी महिलाओं की है । उन्हें पूरा सम्मान दिए जाने की जरूरत है समाज को बार बार इस बात को समझाने की जरूरत है कि महिलाओं की कितनी हिस्सेदारी होनी चाहिए । भारत के बहुविध समाज में स्त्रियों का विशिष्ट स्थान रहा हैं । पत्नी को पुरूष की अर्धांगिनी माना गया हैं । वह एक विश्वसनीय मित्र के रूप में भी पुरूष की सदैव सहयोगी रही हैं । कहा जाता हैं कि जहां नारी की पूजा होती हैं वहीं देवता रमण करते है । नारी नर की खान है । वह पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील और विश्व के लिए करूणा संजोने वाली महाकृति है । एक गुणवान स्त्री काँटेदार झाड़ी को भी सुवासित कर देती हैं और निर्धन से निर्धन परिवार को भी स्वर्ग बना देती हैं ।
            भारतीय समाज में नारी का देवी स्वरूपा स्थान है । एक आदर्श नारी धैर्य, त्याग, ममता, क्षमा, स्नेह, समर्पण, सहनशीलता, करूणा, दया परिश्रमशीलता आदि गुणों से परिपूर्ण हैं । महादेवी वर्मा ने कहा है कि ‘‘नारी केवल एक नारी ही नहीं अपितु वह काव्य और प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं । पुरूष विजय का भूखा होता हैं और नारी समर्पण की ‘‘ वास्तव में भारतीय नारी पृथ्वी की कल्पलता के समान हैं । समय परिवर्तनशील हैं । एक समय जब भारत की नारी कुप्रथाओं की बेडि़यों में जकड़ी हुई थी। धीरे धीरे नारी चेतना द्वारा समाज की सोच में बदलाव आया और पारम्परिक मूल्यों में परिवर्तन होता गया। वर्तमान भौतिक वादी युग हैं, आज बदलते परिवेश में अर्थ का महत्व बढ गया हैं अतः अब महिलाओं ने आर्थिक जगत में पैर पसारना प्रारम्भ कर दिया । आज की नारी अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर धनोपार्जन के लिए प्रयत्नशील हुई हैं । प्रत्येक क्षेत्र में अपनी गरिमा रोपित की हैं । जो कार्य पुरूष वर्ग करने को तत्पर रहता हैं महिलाएं भी उस कार्य को सम्पादित करने में पूर्णतः दक्षता लिए हुए हैं। सामाजिक जीवन में युगानुरूप परिवर्तन के लिए राजाराम मोहन राय, मदन मोहन मालवीय, स्वामी विवेकानन्द, सरोजनी नायडू, भगिनी निवेदिता आदि ने अथक परिश्रम किया हैं । अब महिलाएं चार दीवारी से मुक्त होकर स्वतन्त्र वातावरण में सांस लेने लगी हैं । शिक्षा के क्षेत्र में भी पीछे नहीं हैं आज की नारी विज्ञान, तकनीकी, उद्योग, व्यवसाय, शिक्षा, न्याय, अन्तरिक्ष, खेल तथा कृषि व अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रगण्य मानी जाने लगी हैं। अब वह पूर्णतः शिक्षित बनकर उच्च पदों पर आसीन हो धनोपार्जन के लिए भी सशक्त बन गई हैं । इक्कीसवी शताब्दी भारतीय नारी के लिए वरदान सिद्ध हुई हैं । आज की नारी अबला नही सबला बन गई हैं ।
            हमारे यहाँ व्यक्ति की जगह परिवार को समाज की सबसे छोटी इकाई के रूप में माना गया है । व्यक्ति की पहली पाठशाला परिवार होता है । परिवार में व्यक्ति संस्कार लेता है । परिवार व्यक्ति की देखभाल करता है, बचपन और बुढ़ापे में । परिवार में व्यक्ति प्रेम करना सीखता है । परिवार से व्यक्ति रिश्ते बनाना और निभाना सीखता है । परिवार व्यक्ति को स्वयं से ऊपर सोचना सिखाता है । परिवार में व्यक्ति त्याग सीखता है । वो सीखता है कि कैसे समझौता किया जाता है । वो देखता है कि कैसे उसके माँ बाप खुद से पहले घर के अन्य सदस्यों की सोचते हैं । कैसे सीमित संसाधनों में माँ घर चलाती है, कैसे पिताजी दिन भर ईमानदारी से मेहनत करके कमा के लाते हैं । वो बेहतर भविष्य के लिए आज बचाना सीखता है । वो संतुष्ट रहना सीखता है । अपने भाई बहनों के साथ बांटना सीखता है । वो सीखता है कि क्यों माँ अपने से पहले बाकी सबका ख़याल रखती है । वो देखता है कि पिताजी माँ की कितनी चिंता करते हैं । परिवार का व्यक्ति के निर्माण में बड़ा योगदान होता है ।
            इन सभी उपरोक्‍त विशेषताओं को ध्‍यान में रखते हुए अखिल भारतीय रैगर महासभा में महिला प्रकोष्‍ठ का गठन किया गया ताकि समाज के विकास में मातृ शक्ति का पूर्ण सहयोग मिल सके ।

बाहर से दे थाप, एक का भीतर संबल काज ।
गिरहस्थी के चाक पर नर-नारी गढ़ें समाज ।।

(एक कुम्हार जब चक पर घड़ा बनाता है तो उसका एक हाथ बाहर से घड़े को आकार देने के लिए कठोरता से थाप मारता है और दूसरा हाथ अन्दर कोमलता से सहारा देता है, तब जा के एक अच्छा घड़ा बनता है उसी प्रकार परिवार में पुरुष का कठोर अनुशासन और नारी का कोमल संबल स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए जरुरी है)



प्रदेशा अनुसार महिला प्रकोष्‍ठ की सूची


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